UGC सेक्शन 3-C: क्या लिखा है, जिस पर कोर्ट ने पहली सुनवाई में लगाया स्टे?
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 13 जनवरी 2026 को “Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026” नाम से नए इक्विटी नियम लागू किए थे, जिनका मकसद उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव रोकना और समान अवसर सुनिश्चित करना बताया गया। इन नियमों के Section 3(c) के प्रावधान को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान नया स्टे (Stay) लगाया है, क्योंकि इससे जुड़े विवाद गंभीर मान लिए गए हैं।
सबसे बड़ा विवाद Section 3(c) की जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा से जुड़ा है। इस प्रावधान में जाति-आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के खिलाफ होने वाले भेदभाव के रूप में परिभाषित किया गया है। आलोचकों का तर्क है कि इस परिभाषा केवल कुछ वर्गों तक सुरक्षा को सीमित रखती है और सामान्य श्रेणी (General Category) के छात्रों या अन्य समूहों को शिकायत और संरक्षण के दायरे से बाहर कर देती है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि इससे नियम “एकतरफा और भेदभावपूर्ण” बनते हैं और संविधान के समानता (Article 14), भेदभाव निषेध (Article 15) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है।
विवादास्पद नियमों के खिलाफ कहा गया है कि Section 3(c) की यह सीमित परिभाषा उल्टा भेदभाव (reverse discrimination) उत्पन्न कर सकती है और “मामलों के निवारण के लिए समान अवसर केंद्रों, इक्विटी हेल्पलाइंस और जांच तंत्रों” तक सामान्य श्रेणी के लोगों की पहुंच को रोक सकती है। इसीलिए याचिकाकर्ताओं ने इसे असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है।
सुप्रीम कोर्ट ने भी यह माना कि नियमों की भाषा अस्पष्ट है और दुरुपयोग के जोखिम के कारण इन पर रोक लगाई जानी चाहिए। अदालत ने यह स्टे लगाते हुए कहा कि पुराने 2012 के नियम फिलहाल लागू रहेंगे और Section 3(c) सहित नियमों की संवैधानिक वैधता की विस्तृत सुनवाई आगे होगी। अगली सुनवाई 19 मार्च 2026 को निर्धारित की गई है।

